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50 साल बाद जागी कुंभकर्णी नींद, लेकिन बुलडोजर की नजर सिर्फ गरीबों के आशियाने पर!

मिट्टी में मिले 50 साल के सपने: भदेश्वर नाथ में चार परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨भदेश्वर नाथ में गरजा बुलडोजर: न्याय या चयनात्मक कार्रवाई?

⭐भदेश्वर नाथ में गरजा बुलडोजर: गरीबों के आशियाने जमींदोज, रसूखदारों को ‘अभयदान’ क्यों?

⭐न्याय या भेदभाव? चार परिवार हुए बेघर, रसूखदार के निर्माण पर थमी प्रशासन की रफ़्तार।

⭐बस्ती में ‘चयनात्मक’ कार्रवाई: गरीबों पर चला पीला पंजा, रसूख के आगे पस्त हुआ तंत्र।

उत्तर प्रदेश।

बस्ती। जनपद के ऐतिहासिक भदेश्वर नाथ क्षेत्र में जिला प्रशासन के बुलडोजर ने ‘अवैध अतिक्रमण’ के खिलाफ हुंकार तो भरी, लेकिन कार्रवाई के बाद पीछे छूटे मलबे और बेघर परिवारों के आंसुओं ने प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दशकों से बसे परिवारों को बेघर करने के इस अभियान में कानून की सख्ती तो दिखी, लेकिन ‘समानता’ का अभाव चर्चा का विषय बना हुआ है।

💫दशकों का आशियाना मिनटों में जमींदोज

कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए प्रशासन ने भदेश्वर नाथ गाँव में गढ़ही की जमीन पर बने चार मकानों को ध्वस्त कर दिया। प्रशासन का दावा है कि यह करीब 50 वर्षों से चल रहा अवैध कब्जा था। बुलडोजर की दहाड़ ने उन चार परिवारों के सपनों को मिट्टी में मिला दिया, जिनके पास अब खुले आसमान के अलावा कोई छत नहीं बची।

💫सत्ता और रसूख के आगे थमी बुलडोजर की रफ़्तार?

कार्रवाई के दौरान सबसे अधिक चर्चा प्रशासन के ‘पक्षपातपूर्ण’ रवैये की रही। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि एक तरफ गरीब परिवारों के घर जमींदोज किए गए, वहीं दूसरी ओर एक प्रभावशाली व्यक्ति के निर्माण को “अभयदान” दे दिया गया। रसूखदार के कब्जे के कुछ हिस्से को सुरक्षित छोड़ देना प्रशासन की कार्यशैली को संदिग्ध बनाता है। क्या कानून की आँखें रसूख देखकर बंद हो जाती हैं?

“प्रशासन ने शिकायतकर्ता को मौके पर बुलाना भी मुनासिब नहीं समझा। कार्रवाई के अंत में अचानक जेसीबी का खराब होना और अधिकारियों का मौके से नदारद हो जाना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ड्रामा प्रतीत होता है।” — स्थानीय निवासी

💫अधूरा काम और अधिकारियों की रहस्यमयी विदाई

अभियान के अंतिम क्षणों में जो कुछ हुआ, उसने पूरे मामले को और अधिक विवादित बना दिया है। अचानक जेसीबी खराब होने का बहाना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों का मौके से हट जाना कई अनसुलझे सवाल छोड़ गया है। चर्चा है कि यह रसूखदारों को बचाने और कार्रवाई की खानापूर्ति करने की एक रणनीति थी।

प्रशासन के लिए सवाल

  1. ​चयनात्मक कार्रवाई क्यों? अगर गढ़ही की पूरी ज़मीन अवैध कब्ज़ा मुक्त कराई जा रही थी, तो एक ‘रसूखदार’ व्यक्ति के हिस्से को किन कारणों से छोड़ दिया गया? क्या कानून की परिभाषा रसूख के साथ बदल जाती है?
  2. ​जेसीबी की ‘तकनीकी खराबी’ या ‘प्रशासनिक बहाना’? कार्रवाई के अंतिम समय में जेसीबी का अचानक खराब होना और जिम्मेदार अधिकारियों का मौके से चले जाना महज इत्तेफाक है या प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने की सोची-समझी रणनीति?
  3. ​शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति का रहस्य क्या है? इतनी बड़ी कार्रवाई में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए शिकायतकर्ता को मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया? क्या प्रशासन कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा था?
  4. ​50 वर्षों तक सोता रहा विभाग? यदि ज़मीन पर 50 वर्षों से कब्ज़ा था, तो इतने दशकों तक संबंधित राजस्व विभाग और अधिकारी मौन क्यों रहे? क्या उनकी लापरवाही की भी जांच होगी?
  5. ​अब कहाँ जाएंगे ये बेघर परिवार? कड़कड़ाती धूप और बारिश के मौसम में, जिन परिवारों के पास अब सिर छुपाने की जगह नहीं है, क्या प्रशासन ने उनके पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था के लिए कोई मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है?

अवैध कब्जे के खिलाफ कार्रवाई कानून सम्मत हो सकती है, लेकिन यदि वह ‘चयनात्मक’ (Selective) है, तो वह न्याय नहीं, उत्पीड़न है। क्या जिला प्रशासन उन बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी लेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या रसूखदार के उस ‘बचे हुए हिस्से’ पर दोबारा बुलडोजर चलेगा या प्रशासन की जेसीबी केवल गरीबों की झोपड़ियों तक ही सीमित रहेगी?

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